2050 तक दक्षिणी बिहार में सुनाई दे रही जलसंकट की आहट

झारखंड की सीमा से सटे दक्षिणी बिहार के कई जिलों को अगले तीस वर्षो में सूखे का सामना करना पड़ सकता है. यहां जलसंकट की आहट साफ सुनाई पड़ रही है. यहां बारिश की मात्रा में 40 से 60 फीसद तक की कमी आ सकती है. अगर अभी से सचेत नहीं हुए तो यहां की कृषि से लेकर आम जनजीवन पर इसका बहुत गहरा कुप्रभाव पड़ सकता है. केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सहयोग से कराए गए शोध की रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय को भी दी गई है.

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यह शोध दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) के पर्यावरण विभाग के प्राध्यापक प्रधान पार्थ सारथी ने किया है. उन्होंने कहा है कि झारखंड से सटे गया, औरंगाबाद, सासाराम, कैमूर, जमुई, लखीसराय व बांका में खास असर हो सकता है, जहां अभी भी 35 से 50 फीसद कम बारिश हो रही है.

फाइल फोटो: कैमूर पहाड़ी पर चुआडी से पानी निकालती महिलाएं

इस शोध में बिहार में 1961 से 2013 तक हुई बारिश के जिलावार आंकड़ों का अध्ययन किया गया है. इसकी गणना इंटरनेशनल मैथेमैटिकल मॉडल पर की गई है. प्रो. पार्थ सारथी के मुताबिक सूखा व बारिश के मद्देनजर बिहार को चार जलवायु क्षेत्र में बांटा गया है.

कृषि जलवायु क्षेत्र-1 (पश्चिम व पूर्वी चंपारण, सिवान, सारण, सीतामढ़ी, शिवहर, मुजफ्फरपुर, वैशाली, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, गोपालगंज व बेगूसराय) में 1961 से 2013 के बीच सामान्य से 10 से 20 फीसद कम बारिश हुई है.

जलवायु क्षेत्र-2 (पूर्णिया, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, खगड़िया, अररिया व किशनगंज) और जलवायु क्षेत्र-3 ए (शेखपुरा, मंगुेर, जमुई, लखीसराय, भागलपुर और बांका) एवं जलवायु क्षेत्र-3 बी (कैमूर, रोहतास, भोजपुर, बक्सर, अरवल, पटना, नवादा, जहानाबाद, औरंगाबाद व गया) में सामान्य से 35 से 50 फीसद तक कम बारिश दर्ज की गई. इसका प्रभाव इन जिलों में सूखे के तौर पर देखा जा सकता है.

फाइल फोटो

रिपोर्ट के अनुसार जुलाई व अगस्त में बंगाल की खाड़ी से चलने वाली पूर्वी हवा में पहले की तुलना में नमी की मात्रा कम होती जा रही है. इस कारण इसके प्रभाव वाले जिलों में 20 से 30 फीसद कम बारिश हो रही है. पूर्वी हवा के कमजोर होने के कारण बंगाल से सटे जिलों में ही बादल बरस जाएंगे. इससे उन जिलों में औसत बारिश की संभावना आगामी वर्षो में बढ़ने की संभावना है.

राज्य में एक जून से 30 सितंबर के बीच औसत 102 सेंटीमीटर बारिश सामान्य मानी जाती है. इससे 15 से 30 फीसद कम बारिश होने पर सूखा माना जाता है. प्रो. पार्थ सारथी ने कहा कि परंपरागत जलस्रोत को जीवित करना जरूरी है. तालाब, आहर, पईन, नहर व झील आदि में बारिश के पानी को लंबे समय तक जमा रखा जा सकता है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जल जीवन हरियाली के तहत इस दिशा में सार्थक कदम भी उठाए हैं.

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