रोहतास की अंशु को बीएचयू में कानून की पढ़ाई में मिले पांच गोल्ड

लोग यू ही नहीं कहते कि खुले आसमान की ऊंची उड़ान है बेटी, हर मां-बप का गर्व और सम्मान है बेटी, दुश्मनों का मुकाबला डट के कर सकती है बेटी, अरे अब तो मत जांधों बेड़ियों में इनको, क्योंकि मौका मिले, तो ऊंची उड़ान भी भर सकती है बेटी. सरकार के बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ नारों पर नूरहसन उर्फ शाहनील खा ने अपने ये उद्गार व्यक्त किये, जिसे साकार करने के लिए जिले के बिक्रमगंज की एक बेटी ने देश की टॉप यूनिवर्सिटी में शुमार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पांच गोल्ड मेडल हासिल कर अपने बुलंद हौसले को जाहिर कर दिया। नाम है अंशु कुमारी, जो बिक्रमगंज अनुमंडल अंतर्गत बसौरा गांव निवासी अधिवक्ता दंपति प्रेमलता कुमारी व अखिलेश कुमार की बड़ी पुत्री है.

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के 101वें दीक्षांत समारोह मे अंशु को विधि संकाय की फाइनल परीक्षा के छटवें समेस्टर में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए पांच गोल्ड मेडल से नवाजा गया. इसमें तीन गोल्ड मेडल फाइनल परीक्षा में बेहतर अंक पाने के लिए और दो गोल मेडल सर्वश्रेष्ठ सीजीपीए पाने के लिए दिया गया. बीएचयू यूनिवर्सिटी की ओर से मिले इस गोल्ड मेडल का नाम है महेंद्र नाथ द्विवेदी मेमोरियल गोल्ड मेडल, प्रख्यात अधिवक्ता बाबू सागर सिंह गोल्ड मेडल, स्वर्गीय कांति कुमार मेमोरियल गोल्ड मेडल और यूनिवर्सिटी ओल्ड ब्वायज गोल्ड मेडल. बता दें कि बीएचयू ने 101वें दीक्षांत में 29 होनहारों को गोल्ड मेडल से सम्मानित किया है.

अपने माता-पिता के साथ अंशु कुमारी

जन्म के साथ बिक्रमगंज में अध्ययनरत अंशु ने प्राथमिक शिक्षा नगर के डिवाइन लाइट पब्लिक स्कूल से पायी. इसके बाद नगर के ही रामाधार सिंह उच्च विद्यालय, धनगाई से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास की. इसके बाद अंजवित सिंह महाविद्यालय से इंटर प्रथम श्रेणी से पास करने के बाद 2013 में बीएचयू में सामाजिक विज्ञान विषय से प्रथम श्रेणी से ही स्नातक किया और वहीं पर विधि की तीन वर्षीय पढ़ाई पूरी की. उसके फाइनल परिणाम में अंशु ने अपने बेहतर प्रदर्शन से सभी को चकित कर दिया.

अंशु के पिता ने बताया कि जब विद्यालय प्रबंधन बेटी को सम्मानित कर रहा था, तब हमदोनों पति-पत्नी की आंखों में खुशी के आंसू भर गये थे. उन्होंने कहा कि संतान के रूप में हमारी केवल दो बेटियां ही हैं. बेटी के हौसले और लगन ने हमें गौरवान्वित किया है. बेटियों की इस उपलब्धि पर पैतृक गांव संझौली प्रखंड के बसौरा में भी लोग खाफी खुश हैं. जो लोग कल तक बेटियों को बेटों से कम आंकते थे, आज वहीं लोग बेटियों में अपने जीवन का भविष्य तलाशने लगे हैं. हमें भी आज इस बात का फक्र है कि हम ऐसी दो बेटियों के माता-पिता हैं, जिनके कारनामों ने हमारी पहचान बदल दी.


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