रोहतास के अर्जुन के आंगन में फुदकती हैं हजारों गौरैया, स्पैरो मैन की मिली है उपाधि

मानव मित्र कही जाने वाली गौरैया अब लुप्त हो रही हैं. हालांकि गांवों में अब भी बेहतर माहौल होने की वजह से गौरेया देखने को मिल जाती है, लेकिन शहर में स्थिति चिंताजनक है. शहर में बढ़ता ध्वनि प्रदूषण गौरैया की घटती आबादी के प्रमुख कारणों में से एक है. पर्यावरण के जानकारों के मुताबिक घरों के बनावट में तब्दीली, बदलती जीवन-शैली, खेती के तरीकों में परिवर्तन, प्रदूषण, मोबाइल टाॅवर और दूसरे वजहों से ऐसा हो रहा है. गौरैया पर बचाने के लिए हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है.

इन्हीं गौरैयों के प्रति अगाध प्रेम ने रोहतास जिले के करगहर थाना क्षेत्र के मेड़रीपुर गांव के अर्जुन सिंह को स्पैरोमैन बना दिया है. अर्जुन के आंगन में हजारों गौरैया आज भी फुदकती हैं. यह एक दिन में संभव नहीं हो पाया है. गौरैयों को बचाने के लिए लगभग एक दशक के परिश्रम व मेहनत से उन्हें यह मुकाम हासिल हुआ है. उनके प्रयास से कई गांवों में गौरैयों की चहचहाहट गूंज रही है. उनका कहना है कि पर्यावरण और पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण में इसका महत्वपूर्ण योगदान है.

अर्जुन बताते है कि 2004 में पिता और 2005 में पत्नी के निधन के बाद अपनी उदासी और अकेलापन के कारण गांव आ गया था. उसी वक्त की बात है खाना खाते समय कुछ गौरैया पास तक आती थी. तब बस यूं ही मैं उनकी तरफ खाना फेंकने लगा. गौरैयों को खाना मिलने लगा तो वे रेगुलर मेरे पास जुटने लगीं. इसके बाद साल 2007 के शुरुआती महीनों की एक और घटना के कारण गौरैया के और करीब आ गए. वह बताते हैं अपने घर के आंगन में बैठे थे. तभी एक गौरैया का बच्चा चोटिल अवस्था में उनके पास गई. उन्होंने गौरैया के बच्चे को उठाकर उसका इलाज किया और उसे दाना-पानी देना शुरू कर दिया.

धीरे-धीरे गौरैया का आना-जाना वहां शुरू होने लगा. देखते ही देखते उनके आंगन में सैकड़ों गौरैया का जमावड़ा दिखने लगा. इससे उन्हें शांति और खुशी मिली और गौरेया को नियमित सुबह-शाम दाना-पानी देने लगे. उन्होंने घर में गौरेया के लिए घोंसला बनाना शुरु किया. उनके बड़े से कच्चे-पक्के घर में ऐसे घोंसले बनाने के लिए जगह की कमी भी नहीं थी. अभी उनके घर में करीब एक हजार घोंसले हैं. इसके साथ ही उन्होंने घर की छत, उसकी चारदीवारी और दूसरी कई जगहों पर गौरैया के प्यास बुझाने का इंतजाम भी कर रखा है.

अर्जुन का कहना है कि गौरैयों को आबाद करने में बच्चों ने भी खास भूमिका निभाई है. गौरैया से दूर रहने पर बैचैनी महसूस होती है. उनके इस समर्पण के लिए उन्हें स्पैरोमैन के नाम से लोग जानने लगे है. सरकार ने 2013 में गौरैया को राज्य सरकार ने राजकीय पक्षी घोषित किया था. जिसके बाद बिहार सरकार का पर्यावरण एवं वन विभाग सरकारी आवासों में गोरैया के लिए घोंसला लगाने की योजना पर अर्जुन सिंह की मदद ली गई थी.

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